एनआईएम में बनाएं कैरियर

अगर आप साहस, रोमांच व चुनौती से एक साथ रूबरू होना चाहते हैं, तो एनआईएम यानी उत्तरकाशी स्थित नेहरू इंस्टीट्य़ूट ऑफ माउंटेनियिरग चले आएं यहां चुनौती भरे पहाड़ न केवल आपके जज्बे को परखेंगे, बल्कि पहाड़ जैसी मुश्किलों से जीतने की शिक्षा भी मिलेगी।
14 नवंबर 1965 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नाम से एनआईएम की नींव रखी गई। देश-दुनिया में साहसिक खेलों, पर्यटन व चुनौती भरे क्षेत्रों में कैरियर संवारने में एनआईएम लगातार नई बुलंदियां छू रहा है। यहां से प्रशिक्षण लेने के बाद देश के ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के कई लोगों ने अलग-अलग क्षेत्रों में लक्ष्य हासिल कर नाम कमाया है। पहाड़ की चुनौतियों से आसान तरीकों से निपटने और प्रकृति व पर्यावरण को ध्यान में रख कर दिए जाने वाले प्रशिक्षण के लिए हर वर्ष विश्वभर से यहां लोगों की कतारें लगी रहती हैं। पहाड़ को नजदीक से परखने और इसकी सुन्दरता, शांत स्वभाव, विकराल रूप व कदम-कदम पर चुनौती से रूबरू होना है तो एनआईएम से प्रशिक्षण जरूरी है।
प्रशिक्षण लेने के बाद: एनआईएम से प्रशिक्षण लेने के बाद न केवल सरकारी नौकरी पक्की मानी जाती है, बल्कि ट्रैकिंग, पर्वतारोहण, रॉक क्लाइंबिंग, हिमालय ईको टॉस्क, रैपलिंग, टीम बिल्डिंग, पहाड़ों व प्रकृति के बारे में जानकारी व आपदा प्रबंधन के गुर सीखने के बाद कई प्राइवेट सेक्टर में भी कैरियर संवारने के मौके मिलते हैं। इसके अलावा निजी स्तर पर बिजनेस कर आजीविका व आर्थिक स्थिति सुधारने में प्रशिक्षण महत्वपूर्ण साबित होते हैं।
बेहतर है जॉब: भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन इस संस्थान में राज्य सरकार की भी सहभागिता होती है। रक्षा मंत्री संस्था का अध्यक्ष व मुख्यमंत्री उपाध्यक्ष होता है। इसके अलावा संस्थान में सेना के कर्नल रैंक के ऑफिसर प्रधानाचार्य, उप प्रधानाचार्य, डॉक्टर आदि पदों पर तैनात रहते हैं। इसके अलावा सिविलियन को भी यहां सीधी भर्ती से नौकरी दी जाती है।
उद्देश्य: संस्थान युवक, युवतियों व स्कूली बच्चों को पहाड़ के नेचर के अनुरूप तैयार कर प्रकृति को संरक्षित रखते हुए जीवन में कुछ नया करने का जज्बा सिखाता है। इसके अलावा प्रशिक्षुओं को साहसी, निडर व जिम्मेदारी के निर्वहन योग्य भी तैयार किया जाता है।
प्रशिक्षण क्षेत्र: संस्थान का प्रशिक्षण क्षेत्र यूं तो विश्वभर में है, लेकिन उत्तराखंड के गढ़वाल व कुमाऊं के हिमालयी क्षेत्र में संस्थान अधिकांश प्रशिक्षण देता है। राज्य की नंदा देवी, कामेट, चैखम्बा, सतोपंत, शिवलिंग, भागीरथी ग्रुप, गंगोत्री ग्रुप, थलय सागर, तेखला, डोकराणी बामक, गोमुख, नचिकेता ताल, दयारा बुग्याल, डोडीताल आदि स्थानों पर ट्रैकिंग व पर्वतारोहण का कोर्स कराया जाता है।
कैरियर की संभावनाएं: साहसिक खेलों, पैरा मिलिट्री, सेना, खेलकूद विभाग, पर्यटन, आपदा प्रबंधन, कंस्ट्रक्शन विभाग, राज्य व केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों में गाइड से लेकर ऑफिसर तक बनने की संभावनाएं।
स्कॉलरशिप: संस्थान गरीब व निर्धन छात्र-छात्राओं को कोर्स करने में अनुदान के अलावा स्कॉलरशिप भी देता है, जिसके लिए संस्थान को इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन भी मदद करता है।
संस्था के प्रमुख कोर्स:
बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स
एडवांस माउंटेनियरिंग कोर्स
एडवेंचर कोर्स
सर्च एंड रेस्क्यू कोर्स
मैथड ऑफ इंस्ट्रक्शन
स्पेशल कोर्स
एनआईएम कैंपस: देहरादून से 160 किमी की दूरी तय करने के बाद उत्तरकाशी शहर पहुंचते हैं। यहां से 5 किमी की दूरी तय कर एनआईएम पहुंच सकते हैं। यहां अंतर्राष्ट्रीय मानकों की आर्टीफिशियल वॉल, इलेक्ट्रॉनिक वॉल, स्टूडेंट हॉस्टल, लाइब्रेरी, हिमालयन म्यूजियम, पर्वतारोहण से संबंधित उपकरण एवं सामान के लिए दुकान, ज्ञान हॉल, जयहर्ष बहुगुणा प्रेक्षा गृह, मंदिर एवं प्रशिक्षण से संबंधित कई इमारतें हैं। संस्थान के प्रधानाचार्य कर्नल अजय कोठियाल बताते हैं कि एनआईएम से कोर्स करने के बाद प्रशिक्षु किसी भी क्षेत्र में बेहतर कैरियर बना सकता है। देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में एनआईएम गुणवत्ता एवं नई तकनीकी के साथ पर्वतारोहण का प्रशिक्षण देता है। यहां से प्रशिक्षण के बाद लोगों ने विश्व की सभी कठिन, ऊंची एवं चुनौती से भरी चोटियों पर तिरंगा लहराया है।