कांग्रेस की पर्दे के पीछे की ताकत हैं अहमद, इसलिए हराने में जुटी भाजपा

अहमदाबाद/नई दिल्ली। 67 साल के अहमद पटेल कांग्रेस के शीर्ष परिवार की तीन पीढिय़ों को सियासी मंत्र पढ़ाते रहे हैं। सीधे चुनाव से परहेज कर विधानसभा के रास्ते पांचवीं बार राज्यसभा में जाने का इस बार का प्रयास उनके सियासी जीवन की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से उनकी सियासी अदावत ने उन्हें चक्रव्यूह में फंसा दिया है। मंगलवार को गुजरात में हो रहे रास चुनाव उनके भावी सियासी जीवन का भी रास्ता तय करेंगे। जीते तो कद बरकरार रहेगा, हारे तो हाशिए पर जा जाएंगे। पटेल को 2004 व 2009 के लोस चुनावों में संप्रग की जीत का अहम रणनीतिकार माना जाता है। कांग्रेस व संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार के नाते वे मनमोहन सरकार के कई अहम फैसलों में निर्णायक भूमिका निभाते थे। उनकी भूमिका कांग्रेस संगठन से लेकर सरकार तक सबसे ताकतवर नेता के रूप में थी। नियुक्तियों, पदोन्नतियों से लेकर फाइलों पर फैसलों तक में उनका सिक्का चलता था। वे कांग्रेस के कुछेक नेताओं में हैं, जिनकी गांधी परिवार की तीन पीढिय़ों (राजीव, सोनिया व अब राहुल) से अत्यंत करीबी रही। पटेल 1977 में 26 साल की उम्र में गुजरात के भरुच से लोस चुनाव जीतकर सबसे युवा सांसद बने थे। तब देश में आपातकाल के खिलाफ आक्रोश से पनपी जनता पार्टी की लहर चल रही थी। ऐसे में उनका जीतना पार्टी के लिए चौंकाने वाला था। वे 1993 से राज्यसभा सदस्य हैं। पांचवीं बार फिर किस्मत आजमा रहे हैं। उनकी रुचि मंत्री बनने में नहीं बनवाने में रही। मुद्दा उछालने व हवा देने में माहिरपर्दे के पीछे से सियासी रणनीति के मास्टर माइंड पटेल को मुद्दे बनाने व उछालने का महारथी माना जाता है। गुजरात में ऊना दलित कांड हो या आंध्र में रोहित वेमूला की फांसी का मामला अथवा सांप्रदायिकता का मसला पटेल इनसे जुड़े रहे हैं।