‘चार साहिबजादे: राइज ऑफ बंदा सिंह बहादुर

indexऐतिहासिक घटनाओं, किरदारों या धर्म से जुड़े विषयों पर फिल्म बनाने पर आजकल विवाद होते देर नहीं लगती। फिल्मकार कितनी भी बारीकी से अध्ययन कर ले और कितने ही डिस्क्लेमर दे, आपत्ति करने वाले कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेते हैं। लेकिन निर्देशक हैरी बावेजा ने दो साल पहले ‘चार साहिबजादे बना कर ये साबित किया कि विवादों से बच कर भी ऐसे किसी विषय पर फिल्म बनाई जा सकती है।
दो साल पहले कुछ बड़ी फिल्मों के बीच आई ‘चार साहिबजादे ने केवल प्रशंसा बटोरी, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई भी की थी। करीब 70 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार करने वाली यह पहली ऐसी भारतीय एनिमेशन फिल्म बनी, जिसने कई सिनेमाघरों पर 15 हफ्ते से ज्यादा चलने का रिकार्ड भी बनाया। अब इसका सीक्वल ‘चार साहिबजादे : राईज ऑफ बंदा सिंह बहादुर रिलीज हुआ है, जिसमें सिख योद्धा बंदा सिंह बहादुर की कथा को दर्शाया गया है।
मोटे तौर पर ये कहानी है लक्ष्मण दास के माधो दास और फिर बंदा सिंह बहादुर बनने की। ये कथा शुरू होती है सन 1705 में पंजाब में हुई कुछ घटनाओं से। सिरहंद में मुगल सल्तनत का एक हुक्मरान वजीर खान कहर बरपा रहा है। वह चुन चुनकर सिखों को मार रहा है। पंजाब के बाकी प्रांतों में भी उसका आतंक है। चार साहिबजादों की शहादत के बाद अब वह गुरू गोबिंद सिंह की तलाश में है।
उधर, इन सब बातों से दूर एक संत माधो दास अपनी साधना में लीन है। तभी उसका एक भक्त आकर उसे बतात है कि उसके डेरे पर किसी और ने कब्जा कर लिया है। गुस्से में माधो दास अपने डेरे पहुंचता है तो उसे वहां गुरु गोबिंद सिंह मिलते हैं, जो उसे जीवन से असल मकसद से वाकिफ करवाते हैं। माधो दास उनसे बेहद प्रभावित होता है और वह उनका अनुयाई बन जाता है।
गोदावरी नदी स्थित ये डेरा अब गुरू गोबिंद सिंह की वाणी से गूंजने लगा है। उनके कहने पर ही माधो दास को एक योद्धा बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है। एक कुशल तीरंदाज तो वह बचपन से हैं, लेकिन अब उसे तलवारबाजी और घुड़सवारी का भी प्रशिक्षण लेना है। इसी दौरान माधो दास को वजीर खान के आतंक की भी जानकारी मिलती है। उसे पता चलता है कि किस तरह से वजीर खान ने गुरु गोबिंद सिंह के दो बच्चों को दीवारों में चुनवा दिया था।
ये सब सुन माधो दास का खून खौल उठता है। इसी बीच खबर आती है कि वजीर खान का कहर पंजाब के अन्य प्रांतों में तेजी से फैल रहा है, जिस पर काबू पाने के लिए गुरू गोबिंद सिंह, माधो दास को अमृत चखा कर उसे बंदा बहादुर का नाम देते हैं और उसे वजीर खान के खिलाफ युद्ध करने का फरमान भी जारी करते हैं। लेकिन इसी बीच वजीर खान का एक गुप्तचर उन पर हमला कर उन्हें घायल कर देता है। अब बंदा सिंह को अकेले ही वजीर खान से टक्कर लेनी है। वह अपने कुछ साथियों साथ सिरहंद की तरफ कूच करता है, लेकिन रास्ते में हुई कई घटनाएं उसका रुख जरूर बदल देती हैं, लेकिन मकसद नहीं।
बंदा सिंह धीरे-धीरे लोगों को इक_ा करना शुरू कर देता है और दूसरे प्रांतों के लोगों को जोडऩा भी। उसके शौर्य के साथ उसकी ताकत भी बढऩे लगती है और देखते ही देखते वह कई जगहों से वजीर खान की ताकत को कमजोर कर देता है। शाही खजाने को लुटने के बाद वजीर खान की नींद खुलती है और फिर युद्ध का समय आ जाता है। अब तक बंदा सिंह के साथ हजारों लोग जुड़ चुके हैं और वह वजीर खान से युद्धा के लिए बिलकुल तैयार है। हालांकि वजीर खान की सेना के सामने उसके लड़ाकों की संख्या बहुत कम है, लेकिन वह मुगल सेना पर भारी पड़ता है और वजीर खान को हरा कर सिरहंद पर कब्जा कर लेता है।
ये फिल्म हिन्दी और पंजाबी भाषा में डब की गई है और इसे 2डी और 3डी में देखा जा सकता है। दूसरी बात ये कि किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए निर्देशक ने जिन लोगों की आवाजों का इस्तेमाल पात्रों की डबिंग के लिए किया है, उन्हें जाहिर नहीं किया है। फिल्म में केवल एक ही चिर परिचित आवाज है। पूरी फिल्म को एक कथावाचक के रूप में अभिनेता ओम पुरी ने अपनी आवाज दी है। एक और अच्छी बात ये भी कि गुरू गोबिंद सिंह के न तो हाव-भाव दर्शाए गए हैं और न ही बोलते हुए दिखाया गया है। आप केवल उनके विचारों और मन की बातों को सुन सकते हैं।
एक प्रेरक योद्धा और उसके प्रराक्रम एवं अपने गुरू में आस्था रखने वाले इंसान की कथा की वजह से कहानी दिल को छू जाती है। फिल्म ठीक वहीं से शुरू होती है, जहां इसका पहला भाग समाप्त हुआ था। ये एक वजह है कि आप इससे बिना किसी हिचकिचाहट के सीधे जुड़ सकते हैं। फिल्म का एनिमेशन बढिय़ा है। इसे और उन्नत बनाया जा सकता था। एनिमेशन के मामले में हमारे यहां अभी कल्पनाशीलता और व्यक्त करने की कला की कमी है। ये कमी इस फिल्म में भी दिखती है।
फिल्म का संगीत का काफी बढिय़ा है। खासतौर से सुखविंदर सिंह की आवाज में बाबा बुल्लेशाह वाला गीत। फिल्म में एक पल को लगता है कि मुगलों ने सिखों पर खूब अत्याचार किए, लेकिन इसमें आपसी सौहार्द बढ़ाने वाले भी कई सीन हैं। खासतौर से एक मुस्लिम युवती द्वारा शहादत स्थल पर दीया जलाने जाना। ओम पुरी की दमदार आवाज पूरी फिल्म में गूंजती है। फिल्म के अंत में ऐतिहासिक चीजों को तारीख और स्थल के रूप में दर्शाता आपकी जानकारी में इजाफा करेगा। ये कुछ बातें है, जो फिल्म में उत्सुकता जगाए रखती हैं और फिल्म से बंधे रहते हैं। लेकिन फिल्म की लंबाई अंत के दृश्यों में काफी अखरती है।
इस फिल्म को कम से कम 15-20 मिनट छोटा किया जा सकता था, जिससे यह और अच्छी बन सकती थी। मोटे तौर पर ये फिल्म न केवल आस्था जगाने वाली फिल्म है, बल्कि नई पीढ़ी की जानकारी बढ़ाने वाली फिल्म भी है।
आवाज/कथावाचक: ओम पुरी
निर्देशक-लेखक-पटकथा: हैरी बावेजा
निर्माता: पम्मी बावेजा, ज्योति देशपांडे
संगीत: जयदेव कुमार, रब्बी शेरगिल, निर्मल सिंह, हैरी बावेजा
रेटिंग 2.5 स्टार