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जज बोले-निजता मौलिक अधिकार संविधान के आर्टिकल 21 का हिस्सा

– तीन तलाक पर रोक के बाद एक सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया दूसरा ऐतिहासिक फैसला
– निजता मौलिक अधिकार
नई दिल्ली। राइट टू प्राइवेसी यानी निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है और यह संविधान के आर्टिकल 21 (जीने के अधिकार) के तहत आता है। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक बेंच ने सर्वसम्मति से यह फैसला किया। बेंच में चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस चेलामेश्वर, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम सप्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल, जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। तीन तलाक पर रोक के बाद एक सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट का यह दूसरा ऐतिहासिक फैसला है।
कोर्ट ने 1954 में 8 जजों की संवैधानिक बेंच के एमपी शर्मा केस और 1962 में 6 जजों की बेंच के खडग़ सिंह केस में दिए फैसले को पलट दिया। इन दोनों ही फैसलों में निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया था। हालांकि, ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि निजता का अधिकार कुछ तर्कपूर्ण रोक के साथ ही मौलिक अधिकार है। कोर्ट के मुताबिक, हर मौलिक अधिकार में तर्कपूर्ण रोक होते ही हैं। जीवन का अधिकार भी संपूर्ण नहीं है। राइट टू प्राइवेसी का मुद्दा तब उठा, जब सोशल वेलफेयर स्कीम्स का फायदा उठाने के लिए आधार कार्ड को केंद्र ने जरूरी कर दिया और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पिटीशंस दायर की गईं। इन पिटीशंस में आधार स्कीम की कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी को यह कहकर चैलेंज किया गया कि ये प्राइवेसी के बुनियादी हक के खिलाफ है।
इसके बाद 3 जजों की बेंच ने 7 जुलाई को कहा कि आधार से जुड़े सभी मुद्दों का फैसला बड़ी बेंच करेगी और चीफ जस्टिस कॉन्स्टिट्यूशन बेंच के गठन का फैसला लेंगे। तब चीफ जस्टिस जेएस खेहर के पास मामला पहुंचा। उन्होंने 5 जजों की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच का गठन किया। इस बेंच ने 18 जुलाई को 9 जजों की बेंच के गठन का फैसला लिया।
जानिए, क्या है निजता का अधिकार?: आज सुप्रीम कोर्ट राइट टू प्राइवेसी यानी निजता के अधिकार पर फैसला सुना दिया लेकिन क्या आपको पता है कि निजता का अधिकार है क्या? हमारे संविधान में सीधे तौर पर निजता के अधिकार का जिक्र नहीं है। हालांकि व्यवहारिकता में इसे अनुच्छेद 21, सम्मान से जीवन के अधिकार का हिस्सा माना जाता है। जिसका मतलब यह है कि अगर कानूनी बाध्यता ना हो और कानूनी रास्ता ना अख्तियार किया जाए तो सरकार किसी की निजता का हनन नहीं कर सकती।
सरकार को तगड़ा झटका: यह फैसला सरकार के लिए तगड़ा झटका है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा था कि निजता मौलिक अधिकार नहीं है। अब इस फैसले का सीधा असर आधार कार्ड और दूसरी सरकारी योजनाओं के अमल पर होगा। लोगों की निजता से जुड़े डेटा पर कानून बनाते वक्त तर्कपूर्ण रोक के मुद्दे पर विचार करना होगा। सरकारी नीतियों पर अब नए सिरे से समीक्षा करनी होगी। यानी आपके निजी डेटा को लिया तो जा सकता है, लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। हाालंकि, इस फैसले से आधार की किस्मत नहीं तय होगी। आधार पर अलग से सुनवाई होगी। बेंच को सिर्फ संविधान के तहत राइट टू प्राइवेसी की प्रकृति और दर्जा तय करना था। 5 जजों की बेंच अब आधार मामले में ये देखेगी कि लोंगो से लिया गया डेटा प्राइवेसी के दायरे में है या नहीं। अब सरकार के हर कानून को टेस्ट किया जाएगा कि वो तर्कपूर्ण रोक के दायरे में है या नहीं। कुछ जानकारों का मानना है कि इस अधिकार के तहत सरकारी योजनाओं को अब चुनौती दी जा सकती है।