तावड़ो: संदेश देती कहानी

बरसों के बाद राजस्थानी भाषा में कोई अच्छी और क्वालिटी वाली फिल्म आई है। फिल्म ‘तावड़ो का पूरा ताना-बना राजस्थान के परिवेश पर आधारित है। कहानी कुछ ऐसी है, जो शुरू से आखिर तक दर्शक को बांधे रखती है। फिल्म फ्लैश बैक में है। राजस्थान में सदियों तक गहरे पैठे रही छुआछूत की समस्या पर आधारित यह फिल्म मानवता के पक्ष में संदेश देती है।
फिल्म का आधा समय बाल कलाकारों की अठखेलियों से गुजरता है, क्योंकि संतान मोह से गांव की एक बड़ी सामाजिक समस्या सुलझती है। निर्देशक को रेगिस्तान की ठेठ (अंतिम) अठखेलियों का बखूबी ज्ञान है, बाल कलाकारों से पूरा काम लिया गया है। रेगिस्तान में पानी से खेलना जुर्म है, आम तौर पर रेगिस्तान में बच्चे इस खेल की पूर्ति अपने पेशाब की धार से बालू रेत पर मांडणे बनाकर करते हैं। निर्देशक ने भली प्रकार से मांडणे बनवाए हैं। लेकिन कई दृश्यों में बाल कलाकार ओवर एक्टिंग के भी शिकार बन जाते हैं।
हीरो काबरा में शक्ति है, ज्ञान है, जो खेती करता है एवं अन्याय के खिलाफ भी लड़ता है। काबरा की पत्नी के रूप में  सह नायिका कोठारी भी थोड़े से दृश्यों में अपनी छाप छोड़ गई हैं। फिल्म की हीरोइन प्रीति झिंगयानी को औरत के आदर्श सुडौल, शारीरिक, सुंदरता के रूप में पेश करके व्यावसायिक बनाने की कोशिश की गई है। भरत शर्मा के नाई के रूप में हास्य दृश्य ऐसे लगते हैं, तावड़े मेंं पानी मिल गया हो।
फिल्म मेें विलेन का रोल महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि फिल्म का कथानक ही एक बहुत बड़ा विलेन बना है, जो सारी फिल्म का आधार है। परन्तु यह समस्या भारत की आजादी के बाद प्राय: ऐतिहासिक रह गई है। लेकिन निर्देशक ने अपने सद्प्रयत्नों से इतिहास को जीवंत किया है एवं मानवता को प्रकट करके विलेन को तपते तावड़े से ताबड़तोड़ जलाया है। अंतिम संस्कार में पंडित बने जोशीजी भी स्वाभाविक रूप से अदाकारी करके ‘तावड़ो का सहयोग करते दिखते हैं।
फिल्म में तकनीकी कमियों के बावजूद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न पारितोषिक मिले हैं। कला पक्ष मजबूत है।
जिस प्रकार से देशी नस्ल की गाय के बैल तपते तावड़े  में खड़े होकर आंनद महसूस करते हैं। फिल्म सरल राजस्थानी बोली में फिल्माई गई है। फिल्म का संगीत बहुत सुकून देता है।
-शिवादित्य कुमार
96363-61833