पहली बार सामने आई नसबंदी आंकड़ों की बाजीगरी

– बाबू के कहने पर अधिकारी ने दी थी सहमति ठ्ठ स्वास्थ्य विभाग की महिला कर्मियों ने जताया रोष
श्रीगंगानगर। परिवार कल्याण के नाम पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी-कर्मचारी अपना ही कल्याण करते हैं। इसी के तहत विभागीय योजनाओं के साथ-साथ नसबंदी के नाम पर आंकड़ों की बाजीगरी का काम कई वर्षांे से जारी है।, लेकिन पहली बार इसकी सच्चाई सामने आने के बाद विभाग में खलबली मची हुई है। यहां तक कि महिला कर्मियों ने भी इसके खिलाफ रोष जताया है।
स्वास्थ्य विभाग पिछले वर्षांे में परिवार कल्याण के तहत प्रदेश में पहले, दूसरे या तीसरे नंबर पर आता रहा है। जिला स्तर पर सर्वाधिक नसबंदी केस करने पर राज्य सरकार द्वारा 30 लाख रुपए का पुरस्कार देने का नियम है। दूसरे नंबर पर 20 और तीसरे स्थान पर रहने वाले जिले को 10 लाख रुपए मिलते हैं। सूत्रों के अनुसार हाल के वर्षांे की परफोरमेंंस को बरकरार रखने के लिए स्वास्थ्य विभाग में नसबंदी आंकड़ों की बाजीगरी की जाती है। इसी बाजीगरी की सच्चाई गत दिवस सामने आ गई, जिसके बाद विभाग में खलबली मची हुई है। बताया जा रहा है कि विभागीय कार्यालय से इतर अन्य स्थान पर जाकर जांच करने का सुझाव सीएमएचओ ऑफिस के एक बाबू का था, जिस पर अधिकारी ने सहमति दी थी। कुछेक महिला कर्मियों ने इस कार्रवाई से खुद को अलग बताते हुए रोष भी जताया है।
आज ऑफिस में हो रहा सत्यापन
विभागीय कार्यालय से इतर आंकड़ों का सत्यापन करने वाली टीम ने मंगलवार को सीएमएचओ ऑफिस में जांच कार्य किया। गत दिवस इस टीम के अधिकारियों ने स्थानीय कर्मचारियों केे साथ अलग स्थान पर नसबंदी आंकड़ों का सत्यापन किया था।
टारेगट सत्यापन में खेल
विभाग द्वारा महिला नर्र्सांे को आबादी के अनुसार वर्षभर में नसबंदी केस लाने की जिम्मेदारी दी जाती है। 10 से लेकर नसबंदी केसों की संख्या 50 तक हो सकती है। महिला नर्सांे द्वारा करवाई गई नसबंदी केसेज की जानकारी संबंधित प्रभारी अधिकारियों के पास होती है। बाद में इन्हीं आंकड़ों की जांच के लिए परिवार कल्याण अधिकारी जिला स्तर पर आते हैं। सूत्रों का कहना है कि इसी जांच में आंकड़ों के सत्यापन के नाम पर खेल होता है।