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बिहार में लोस की सीटों को लेकर गठबंधनों में बढ़ा तनाव

पटना। लोकसभा चुनाव में उतरने के पहले बिहार में सत्ता और विपक्ष के गठबंधनों में आपसी लड़ाई तेज हो रही है। पहले राजग में चेहरे को लेकर बयानबाजी शुरूहुई और अब कांग्रेस तथा राजद एक दूसरे को भांप रहे हैं। एनडीए के घटक दल कुछ अधिक मुखर हैं। कारण एनडीए में अब जदयू भी है, जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में इसमें भाजपा के अलावा केवल लोजपा और रालोसपा शामिल थी। जदयू को हिस्सेदारी देने के लिए इन तीनों दलों को अपनी एकाध सिटिंग सीटों की कुर्बानी देनी पड़ सकती है। जदयू ने 2009 लोकसभा चुनाव में 20 सीटें जीती थीं, जबकि उसके सहयोगी दल भाजपा को 12 सीटें मिली थीं। एनडीए से बाहर होकर जदयू जब 2014 के लोकसभा चुनाव में अकेले मैदान में उतरा तो उसे केवल दो सीटों पर जीत मिली। 2009 में लोजपा यूपीए में थी, जो 2014 में एनडीए में आ गई। नई पार्टी के रूप में उभरी रालोसपा भी एनडीए का हिस्सा बनी और इसने शत-प्रतिशत स्ट्राइक रेट दर्ज किया। जदयू अभी बिहार में बड़े भाई की भूमिका निभाना चाहता है। जदयू के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. अजय आलोक जैसे नेता 2004 और 2009 के चुनाव की दुहाई दे रहे हैं। 2004 में जदयू 26 और भाजपा 14 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जबकि 2009 में जदयू-भाजपा ने 25:15 का फॉर्मूला तय किया था। मगर अभी स्थिति दूसरी है। भाजपा के पास 22 सिटिंग सीटें हैं, जबकि लोजपा और रालोसपा के हिस्से में क्रमश: छह और तीन हैं। जदयू की ओर से यह कहा जाना कि बिहार में एनडीए नीतीश कुमार के चेहरे का अधिक लाभ उठाए, इसे सीट बंटवारे में बड़ी हिस्सेदारी के लिए माहौल बनाने के रूप में देखा जा रहा है। जदयू के आक्रामक रुख से साथी दल असहज जदयू के ऐसे बयान ने एनडीए के अन्य घटक दलों को असहज कर दिया है।