मप्र समेत 10 राज्यों के अध्यापक-शिक्षक सरकारों के खिलाफ

भोपाल। शिक्षा जगत में फैली अराजकता और उस पर स्थानीय सरकारों का नियंत्रण नहीं होने से मप्र समेत 10 राज्यों के अध्यापक-शिक्षक नाराज हैं। इनका कहना है कि एक समान शिक्षा नीति नहीं होने के कारण बच्चों का भविष्य खतरे में है, अध्यापक-शिक्षकों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद स्थानीय सरकारें ध्यान नहीं दे रही हैं। इन सबसे नाराज अध्यापक-शिक्षकों ने स्थानीय सरकारों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। अब वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शरण में पहुंच गए हैं। मप्र समेत 10 राज्यों के अध्यापक व शिक्षकों ने 11 से 13 जनवरी के बीच प्रदेश के विदिशा प्रवास पर आ रहे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत से मिलने का समय मांगा है। प्रदेश के सतना जिले में 7 जनवरी को अध्यापक संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने एक राष्ट्रीय बैठक बुलाई थी। इसमें मप्र समेत उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश व जम्मू कश्मीर राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। बैठक में निर्णय लिया गया कि प्रदेशों में एक समान शिक्षा नीति नहीं है, बार-बार पाठ्यक्रम बदले जा रहे हैं। बच्चों के बस्ते का बोझ कम नहीं हुआ है, शिक्षा की गुणवत्ता में खर्च के हिसाब से सुधार नहीं आ रहा है। निजी क्षेत्रों की दखलअंदाजी लगातार बढ़ रही है। इसके कारण स्थानीय सरकारें शिक्षा पर ध्यान कम दे रही हैं। भर्ती नियमों में असमानताएं हैं, शिक्षक-अध्यापकों के वेतनमान में कई स्तर पर अंतर है। इन कमियों को दूर करने बार-बार धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं, लेकिन कोई ठोस निराकरण नहीं निकला है। बैठक में इन कमियों को दूर करने सभी 10 राज्यों के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रीय पैरा शिक्षक संघर्ष समिति का गठन किया है। समिति के संयोजक व प्रतिनिधियों ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नागपुर कार्यालय में पत्राचार कर विदिशा प्रवास पर आ रहे संघ प्रमुख मोहन भागवत से मिलने का समय मांगा है।