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मरीजों की जान जोखिम में डालने वाला स्पेशियलिटी कोर्स रद्द

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों में लगे सेवारत चिकित्सकों को कराए जा रहे एक साल के स्पेशियलिटी कोर्स को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा है कि इस तरह का कोर्स मरीज की जिन्दगी से खिलवाड़ करने वाला साबित होगा। वहीं अदालत ने अब तक दिए जा चुके प्रमाण पत्रों को ही महत्वहीन घोषित कर दिया है। न्यायाधीश मनीष भंडारी की एकलपीठ ने यह आदेश चिकित्सक रमेश गोस्वामी व अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि एक साल का कोर्स करने के बाद सेवारत चिकित्सक को पीजी कर चुके चिकित्सकों के समान कार्य करने का पात्र बनाना मरीजों की जान जोखिम में डालना है।
याचिका में कहा गया कि वर्ष 2015 में राज्य सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में लगे सेवारत चिकित्सकों का उनके अनुभव के आधार पर एक साल के स्पेशियलिटी कोर्स के लिए चयन किया। इन चयनित चिकित्सकों को पीजी करने वाले दूसरे डॉक्टर्स के साथ ही अध्ययन कराया जाता है। जबकि ऐसे किसी कोर्स को एमसीआई की ओर से मान्यता भी नहीं है। इसके अलावा पीजी की गाइड लाइन के अनुसार एक पीजी पाठ्यक्रम एक सीट-एक फेकल्टी अनुपात में चलता है। ऐसे में राज्य सरकार का यह कोर्स पीजी गाइड लाइन के भी विपरीत है। वहीं कोर्स में प्रवेश के लिए किसी तरह की प्रवेश परीक्षा भी नहीं ली गई। याचिका में यह भी कहा गया कि एक साल का कोर्स करने वाले चिकित्सकों को पीजी कर चुके चिकित्सकों के समान रेडियोलॉजी और एनेस्थिसिया जैसा महत्वपूर्ण काम कराने का भी प्रावधान किया गया। जबकि इस कार्य के लिए पीजी कर रहे चिकित्सक को तीन साल का जटिल अध्ययन करना पड़ता है। वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि ग्रामीण चिकित्सकों की स्किल बढ़ाने के लिए यह कोर्स लागू किया गया है। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने कोर्स को मरीजों के लिए खतरा बताते हुए इसे रद्द कर दिया है।