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शनि, मंगल या राहू से पीडि़त हों तो करें भैरव मंत्र का जाप

इस वर्ष 10 नवंबर 2017 के दिन भैरवाष्टमी मनाई जाएगी। कुछ जगहों पर मतांतर से 11 नवंबर को यह मनाई जा रही है। काल भैरव अष्टमी तंत्र साधना के लिए अति उत्तम मानी जाती है।
भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं। शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। भगवान शंकर के अवतारों में भैरव का अपना एक विशिष्ट महत्व है।
शिवजी ने भैरव को काशी के कोतवाल पद पर प्रतिष्ठित किया है। श्री भैरव से काल भी भयभीत रहता है इसलिए उनका एक रूप ‘काल भैरवÓ के नाम से विख्यात हैं। दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें ‘आमर्दकÓ कहा गया है।
जिन व्यक्तियों की जन्मकुंडली में शनि, मंगल, राहू आदि पाप ग्रह अशुभ फलदायक हों, नीचगत अथवा शत्रु क्षेत्रीय हों। शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से पीड़ति हों, तो वे व्यक्ति भैरव अष्टमी अथवा किसी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से प्रारंभ कर बटुक भैरव मूल मंत्र की एक माला (108 बार) का जाप प्रतिदिन 40 दिन तक करें।
रूद्राक्ष की माला से यह जाप 40 दिनों तक करने से अवश्य ही शुभ फलों की प्राप्ति होगी।
‘ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।Ó
रविवार और मंगलवार को पूजा फलदायिनी है
भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है और नाथ संप्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व रहा है। भैरव आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय प्राप्त होती है। इनकी आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है, रविवार और मंगलवार के दिन इनकी पूजा बहुत फलदायी है।