कापालिक साधुओं के बारे में यह मान्यता काफी प्रचलित है कि यदि कोई असली कापालिक साधु मिल जाए और वह आपसे प्रसन्न हो जाए तो समझो आपकी किस्मत के सारे दरवाजे खुल सकते हैं। हम सभी ईश्वर की आराधना करते हैं। हम सिर्फ सात्विक तरीकों से ही घर में ईश्वर को पूजते हैं, लेकिन ईश्वर ..." />
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ऐसे खुल सकता है किस्मत का पिटारा

कापालिक साधुओं के बारे में यह मान्यता काफी प्रचलित है कि यदि कोई असली कापालिक साधु मिल जाए और वह आपसे प्रसन्न हो जाए तो समझो आपकी किस्मत के सारे दरवाजे खुल सकते हैं।
हम सभी ईश्वर की आराधना करते हैं। हम सिर्फ सात्विक तरीकों से ही घर में ईश्वर को पूजते हैं, लेकिन ईश्वर आराधना तीन तरह से होती है। जो कि क्रमश: वैदिक रीति, वैष्णव रीति और वैदिक-तांत्रिक मिश्रित तरीकों से की जाती है।
तंत्र न तो कोई जादू-टोना है, न ही चमत्कार। यह तो परमात्मा की आराधना का वो मार्ग है। जिसका रास्ता साक्षात् ईश्वर तक जाता है। इस बात का उल्लेख हमारे वैदिक ग्रंथों में मिलता है।
मान्यता है कि कापालिक पंथ से शैव, शाक्त, महेश्वर, कौल आदि मार्ग का प्रचलन शुरू हुआ था। लेकिन कुछ वैदिक इतिहासकारों की मानें तो शैव के शाक्त, नाथ, दसनामी, नाग आदि कपालिक पंत के ही उप संप्रदाय हैं।
कहा जाता है कपालिक
कापालिक संप्रदाय के लोग शैव संप्रदाय के अनुयायी होते हैं। ये लोग मानव खोपडिय़ों (कपाल) के माध्यम से खाते-पीते हैं, इसीलिए इन्हें ‘कापालिकÓ कहा जाता है।
कापालिक संप्रदाय को महाव्रत संप्रदाय भी माना जाता है। इसे तांत्रिकों का संप्रदाय माना गया है। शैव सम्प्रदाय की पाशुपत शाखा के अनुयायियों को कापालिक कहा जाता है।
इसलिए रखते हैं साथ में कपाल
कापालिक साधु इंसानी खोपड़ी में ही खाते और पीते हैं और हमेशा कपाल अपने पास ही रखते हैं। वह ऐसा इसलिए करते हैं ताकि उन्हें यह आभास होता रहे कि पृथ्वी पर मौजूद जीवों का शरीर नश्वर है।
वह दिन-रात मंत्र साधना और तप करते हैँ। ताकि उनको मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त हो।

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