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Movie Review : ‘इंदु सरकार’

हमारे देश में कुछ मुद्दों पर बात की ही नहीं जाती। कभी-कभी सालों में छुटपुट फि़ल्में आ जाती हैं लेकिन विवादास्पद समझ कर कुछ मुद्दों पर फि़ल्में बनाना अक्सर टाल ही दिया जाता है। पार्टिशन, इमरजेंसी जैसे कई मुद्दे हैं जिस पर बात की जानी चाहिए। दुनिया भर के सिनेमा ने अपनी इस तरह की समस्याओं पर कालजयी फि़ल्में बनाई हैं।
नेशनल अवार्ड विनिंग डायरेक्टर डायरेक्टर मधुर भंडारकर ने 1975 की इमरजेंसी के दौर पर फि़ल्म बनायीं जो शायद आज की पीढ़ी के लिए बहुत बड़ी जानकारी है कि आखिऱ उस दौर में हुआ क्या था इमरजेंसी होती क्या है मधुर की इस साहसी फि़ल्म में वो सबकुछ है जो लोकतंत्र के उस काले इतिहास को समझने में आज की पीढ़ी के काफी काम आएगी।
मधुर सिर्फ एक मामले में चूक गए। जो शायद युवा पीढ़ी को गुमराह करे! मधुर ने फि़ल्म की शुरुआत में जोर-शोर से घोषणा कर दी कि यह फि़ल्म काल्पनिक घटनाओं पर आधारित है क्या 1975 की इमरजेंसी कोई काल्पनिक घटना है जब इस विषय पर उन्होंने फि़ल्म बनाने का साहस किया था तो उसे सत्य-घटना पर आधारित बताने की हिम्मत भी उन्हें दिखानी चाहिए थी। संजय गांधी, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी आदि के किरदार भी परदे पर उतारे गए। तुर्कमान गेट की ज़बरदस्ती भी दिखाई गयी। बल प्रयोग से हुई नसबंदियां भी दिखाई गयीं। फिर ये कल्पना कैसे हुई भंडारकर साहब
बहरहाल, मधुर भंडारकर ने एक सशक्त फि़ल्म बनाई है, जिसके लिए वो जाने जाते हैं। विस्तृत रिसर्च के साथ सत्य-घटनाओं को कहानी में पिरोया गया है। इस तरह की कहानी में डर ये होता है कि कहीं डॉकुड्रामा का फील न आ जाए। मगर मधुर इसे एक इंफोटेनमेंट बनाने में कामयाब हुए हैं , जिसमें इन्फॉर्मेशन भी है और इंटरटेनमेंट भी।
अभिनय के बारे में बात करें तो कीर्ति कुल्हरी ‘इंदु सरकार’ के तौर पर पूरी फि़ल्म अपने कंधों पर लेकर चली हैं और सफ़ल भी रही हैं। नील नितिन मुकेश भी अपने किरदार में एकदम जंचे हैं। तोता रॉय चौधरी नवीन के किरदार को जि़ंदा कर देते हैं। कुल मिलाकर इंदु सरकार उन दर्शकों के लिए नहीं है जो सिर्फ मसाला फि़ल्में देखना चाहते और जानते हैं।
फि़ल्म देखने के लिए आपका ग्रे मैटर बहुत ज़रूरी है। अगर वो आपमें आप निश्चित ही इस फि़ल्म का आनंद ले पाएंगे या समझ पाएंगे! मैं इस फि़ल्म को 5 में से 3.5 स्टार देता हूं।