Movie Review : ‘तू है मेरा संडे’

दोस्त और उनकी दोस्ती, उनके आपसी बॉन्डिंग इस पर ढेरों फि़ल्में बन चुकी हैं। दोस्ती का यह एहसास हर इंसान को प्यारा होता है इसलिए भी इक्का-दुक्का छोड़ तकरीबन सारी फि़ल्में जो दोस्ती पर बनी हैं, सफल रही है। इसी तरह की फि़ल्म है ‘तू है मेरा संडे’। इस फि़ल्म में दिखाए गए दोस्त स्कूल या कॉलेज के दोस्त नहीं हैं, यह अलग-अलग उम्र के अलग-अलग वर्ग के मित्र हैं। इनमें से कोई शेयर मार्केट का ब्रोकर है तो कोई मैनेजमेंट कंपनी का मालिक। कोई टेलर है तो कोई क्लर्क। इनका आपस में जुड़ाव है, दोस्ती है तो उसका एक ही कारण है – फुटबॉल के प्रति उन सबका लगाव।
मुंबई जैसे महानगर में जहां जनसंख्या का समुद्र बहता हो, ऐसे में खेलने की जगह कहां मिलेगी? ऐसे में पनपते उनके आपसी रिश्ते, खेलने की जगह का अभाव, परिवार से इन लोगों के रिश्ते जैसे संवेदनशील मुद्दों पर आधारित है- ‘तू है मेरा संडे’। ढेर सारे अंतरराष्ट्रीय महोत्सव की शान बढ़ा चुकी ‘तू है मेरा संडे’ एक बेहतरीन फि़ल्म है। डायरेक्टर मिलिंद धाईमडे ने एक ऐसा संसार रचा है, जिसके आप गवाह भी होते हैं और हिस्सा भी। ये उन चुनिंदा फि़ल्मों में से है जिसके खत्म होने पर आपको लगता है कि इतनी जल्दी क्या थी, फि़ल्म ख़त्म करने की? आप उस दुनिया में डूब जाते हैं।
अभिनय की अगर बात की जाए तो सारे ही कलाकारों ने कमाल का काम किया है। हो सकता है कि शायद आपने इनमें से किसी का नाम सुना भी ना हो, मगर सारे ही कलाकार एक से बढ़कर एक हैं। ख़ास तौर पर शहाना गोस्वामी अपने नैसर्गिक अभिनय से पूरी फि़ल्म पर छाई रहती हैं। टीवी के बड़े सितारे वरुण सोबती भी एक मंझे हुए कलाकार हैं। शहाना के पिता के किरदार में शिव सुब्रमण्यम का हालांकि एक भी संवाद नहीं है मगर उनकी सशक्त उपस्थिति एक अलग आयाम रचती है। कुल मिलाकर यह बात गलत नहीं होगी कि तू है मेरा संडे” एक असरदार और शानदार फि़ल्म है। इसे जरूर देखा जाना चाहिए।
यह बात जरूर ध्यान में रखी जानी चाहिए की फि़ल्म में भले ही बड़े सितारे नहीं हो, लेकिन कुछ फि़ल्में अपने विषय से अपने विषयवस्तु से ढेर सारे बड़े सितारों से लदी फि़ल्मों से कहीं बड़ी होती है। यह फि़ल्म वैसी ही एक फि़ल्म है।
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