Movie Review : ‘शब’

बड़े शहर में रहने वाले कुछ किरदारों की जिंदगी की जटिलताओं का जखीरा दिखाती फिल्म ‘शब’ पहले रिलीज हो चुकी कई फिल्मों का मिश्रण लगती है। फिल्म कई सवाल छोड़ जाती है। फिल्म के डायलॉग काफी अझेल से हैं।
सौ ग्राम ‘फैशन’ के दृश्य और पचास ग्राम ‘बीए पास’ के दृश्य लेकर उन्हें छोटे-छोटे बारीक टुकड़ों में काट लें। अंधेरी रातों के तेल में इन्हें कुछ देर तक चलाएं। इसके बाद इसमें दो चम्मच ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ के दृश्य डालकर कुछ देर धीमी आंच पर पकने दें। पकने के बाद ‘अरे ये मैंने क्या कर डाला’ वाली तेज चीखों से सजा कर परोसें।
निर्देशक ओनीर की फिल्म शब अगर कोई डिश होती तो शायद उसे पकाने का तरीका कुछ ऐसा ही होता। कहीं से उड़ती-उड़ती खबर आई थी कि ओनीर भाई ने इसकी कहानी 17 साल पहले लिखी थी और तब उन्हें लगता था कि यह उस समय के लिहाज से काफी बोल्ड है जिसके चलते उन्होंने इसे 2015 में बनाना ठीक समझा, क्योंकि उन्हें लगता था कि अब समाज भी उतना ही बोल्ड हो गया है। ओनीर भाई, थोड़ा लेट हो गए आप। मने, आपसे पहले (बहुत पहले) कुछ दूसरे डायरेक्टर आपसे मिलती-जुलती कहानियां सुना गए हमें। और अगर इसके बाद भी आपकी यही कहानी सुनाने की जिद थी, तो इसे कहने का अंदाज तो बदल लेते! और एक बात कहें, यह उतनी बोल्ड भी नहीं है जितनी आपको लगी।
कहानी में बहुत सारा केमिकल लोचा है, पर चलिए, आपको सुना ही देते हैं। दिल्ली में कुछ ऐसे युवा किरदार हैं जिनकी जिंदगियां किसी न किसी रूप में आपस में जुड़ी हैं। जिनकी अपनी-अपनी समस्याएं हैं। अपने-अपने सपने हैं। अपनी-अपनी कुंठाएं हैं। इनमें पहला किरदार है मोहन (आशीष बिष्ट), जो मॉडल बनने का सपना लेकर धनॉल्टी से दिल्ली आया है। दूसरा किरदार है सोनल (रवीना टंडन) जो एक हाई प्रोफाइल महिला है और अकेलेपन की शिकार है। तीसरा किरदार है रैना (अर्पिता चटर्जी) जिसका एक कड़वा सच है। चौथा किरदार है नील (एरीस्ज गैंजी) जो एक समलैंगिक युवक है और दिल टूटने की वजह से हताश है।
सोनल अपनी शारीरिक जरूरतें पूरी करने के लिए मोहन को मोहरा बनाती है। मोहन अपने करियर की खातिर उसकी बातों में आ भी जाता है। सोनल वादे के मुताबिक उसे अपने एक फैशन डिजाइनर दोस्त से भी मिलवाती है। वह मोहन को काम तो देता है पर उसका इस्तेमाल भी करता है। साथ-साथ कहानी चलती है रैना की जो अपनी छोटी बहन के साथ रहती है और साथ ही अपने दोस्त नील के कैफे में काम करती है। नील अपने दोस्त से ब्रेकअप होने के चलते दुखी है। इन चारों किरदारों की जिंदगी में इस कदर उथल-पुथल मचती है कि यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर चल क्या रहा है। और सच कहूं तो दिमाग लगाने का मन भी नहीं करता। लगता है चलता रहे जो चल रहा है। बस ये सब जल्दी खत्म हो जाए।
ग्लैमर की दुनिया में ‘समझौते’ करने वाली कहानियां, समलैंगिक रिश्ते, प्यार में दिल टूटने की कहानियां- ये सब हम कई फिल्मों में देख चुके हैं। फिल्म बोर होती तब भी चलता, इसके संवाद सुनकर तो एक अजीब सी खीझ होती है। अर्पिता और रवीना का काम कुछ दृश्यों में प्रभावित करता है। आशीष बिष्ट को फिल्मों में काम करने से पहले एक्टिंग सीखनी चाहिए। फिल्म का संगीत साधारण है, सिवाए एक गीत के जो अरिजित सिंह ने गाया है। फिल्म में आशीष बिष्ट और रवीना टंडन के हताश होकर चीखने के दो अलग-अलग दृश्य हैं। इन्हें देखकर कोई संवेदना नहीं उमड़ती बल्कि हंसी आती है। आशीष के चीखने वाले एक दृश्य में तो एक पास की झोपड़ी में रहने वाला गरीब आकर उससे कह भी देता है कि ‘भाई अपने घर में चिल्लाओ जाकर। मेरे घर के सामने नहीं।’ आशीष के हिस्से में कई मूर्खतापूर्ण संवाद आए हैं। जैसे कि वह नील से कहता है,’भाई एक अच्छी सी लड़की देखकर घर बसा ले।’ इस पर वह उसे घूरता है तो कहता है,’अच्छा किसी के साथ भी बसा ले।’ फिल्म के अंत पर भी कोई मेहनत नहीं की गई। यह बस दर्शकों के लिए चैन की सांस लेकर आता है।
स्टार-1